मेजर सोमनाथ शर्मा को मिला था देश का पहला परमवीर चक्र

परमवीर चक्र भारत का एक ऐसा सम्मान है जिसे हर भारतीय सैनिक पाना चाहता है। अगर बात करें देश के सर्वोच्च सम्मान की तो भारत रत्न को भारत का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है, उसके बाद परमवीर चक्र को देश के दूसरे सर्वोच्च सम्मान का दर्जा दिया जाता है। परमवीर चक्र की स्थापना 26 जनवरी 1950 मे की गई थी जब देश का गणतंत्र लागू हुआ था। लेकिन ज्यादातर यह पुरुष्कार मरणोपरान्त ही दिया गया है।

देश का पहला परमवीर चक्र मेजर सोमनाथ शर्मा को दिया गया था

मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को जम्मू मे हुआ था। इनके पिता और मामा सेना मे थे शायद इसीलिए मेजर सोमनाथ के अंदर भी देश के प्रती जिम्मेदारी की भावनाए बचपन से ही थी लेकिन मामा 1947 की एक जंग मे जापानियों से लड़ते हुए शहीद हो गए । इसी वर्ष सोमनाथ भी 22 फरवरी 1947 को ब्रिटिस भारतीय सेना मे भर्ती हुए।

जब मेजर सोमनाथ सेना मे भर्ती हुए तब दूसरा विस्व युद्ध चल रहा था इसलिए उन्हे मलाया के पास जंग मे भेज दिया गया। वहाँ के युद्ध मे मेजर के साहस के कारण उनको एक खास पहचान मिली। उनकी वीरता और पराक्रम को देखकर लोगो मे मेजर की छवी एक खास फौजी के रूप मे बनने लगी।

15 अगस्त 1947 मे भारत की आजादी के बाद देश को कई घरेलू विवादो से जूझना पड़ा और इसी बीच पाकिस्तान का भी निर्माण हुआ। पाकिस्तान का निर्माण भारत के लिए किसी बड़े भयानक सपने से कम नही था, इसके चलते लाखो लोग मारे गए जिसमे बच्चे, बूढ़े, औरते और मासूम लोग शामिल थे। सबसे चौकाने वाली बात तो यह थी की पाकिस्तान को बने सिर्फ दो महीने ही हुए थे की उसने हमला कर दिया।

22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने हमला कर दिया जब इसकी खबर मेजर सोमनाथ को मिली तो वे भी इस युद्ध मे जाने की सोचने लगे। उस समय सोमनाथ हॉस्पिटल मे भर्ती थे क्योकी उनका एक हांथ टूट गया था उनकी इस हालात को देखकर कोई भी आधिकारी उन्हे जंग मे नही भेज सकता था लेकिन सोमनाथ की जिद के आंगे सबको झुकना पड़ा और उन्हे मंजूरी मिल गई।

सोमनाथ कुमाऊ रेजीमेंट की चौथी बटालियन के डेल्टा कंपनी मे कमांडर थे, उन्होने कश्मीर घाटी के बडगाम पोस्ट को एक टुकड़ी के साथ सम्भाला था। उनकी पोस्ट को दुश्मनो ने तीन तरफ से घेर रखा था और गोली बारी चल रही थी। शहीद होने से पहले उन्होने अपने ब्रिगेड हेडक्वाटर मे मैसेज भेजा था की

” दुश्मन हमसे केवल 50 गज की दूर पर है, हम भारी गोली बारी का सामना कर रहे है। लेकिन मै एक इंच भी पीछे नही हटुंगा, अपने आखिरी सैनिक और आखरी दौर तक लड़ूँगा “

3 नवम्बर 1947 को 24 साल की उम्र मे मेजर सोमनाथ शर्मा युद्ध मे साहस दिखाते हूए वीरगती को प्राप्त हो गए। शहीद हो जाने के तीन दिन बाद उनकी बॉडी को बरामद किया गया उनकी पहचान जेब मे रखे गीता की कुछ पन्नो और लेदर होस्टेर से की गई जिसमे वे अपनी पिस्टल रखते थे। उनकी इस बहादुरी को देखते हुए उन्हे परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

आज तक की बात करें तो परमवीर चक्र का सम्मान सिर्फ 21 लोगों को ही दिया गया है जिसमे से 14 सैनिको को मरणोपरान्त दिया गया।

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